Wednesday, March 11, 2009

***** कुंदन बनते क्यों नहीं?? *****


कुंदन बनते क्यों नहीं?
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भाग्य सुनहरा देख किसी का,
अपने भाग्य पर रोएँ क्यों?
मेहनत कर अपने कर्मों से,
उसको हम बदलें क्यों नहीं??

उस परमात्मा ने जो दिए,
उन हाथों को रख बैठे क्यों?
हम उठा उन्हें पूरी शक्ति से,
बन्धनों को तोड़ते क्यों नहीं??

देख सामने चट्टानों को.
मुड़कर के हम जाएं क्यों?
मिटा उन्हें अपनी शक्ति से,
हम राह बनाते क्यों नहीं??

पग में चुभते काटों से डर,
बढ़ते कदमों को रोके क्यों?
इच्छा शक्ति की अग्नि से,
उन्हें हम जलाते क्यों नहीं??

कठिनाई की अग्नि से डर
अपने आप को रोके क्यों?
उसमे तप तपकर हम सोने से,
कुन्दन बनते क्यों नहीं??

~जयंत चौधरी
(स्व-रचित.... मई ११-१५ २००८)

2 comments:

mehek said...

कठिनाई की अग्नि से डर
अपने आप को रोके क्यों?
उसमे तप तपकर हम सोने से,
कुन्दन बनते क्यों नहीं??

prerak rachana bahut sunder.badhai

अल्पना वर्मा said...

देख सामने चट्टानों को.
मुड़कर के हम जाएं क्यों?
मिटा उन्हें अपनी शक्ति से,
हम राह बनाते क्यों नहीं??


सकारात्मक सोच लिए बहुत ही सुन्दर कविता.

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