Sunday, March 29, 2009

हरा भरा गधा?



हमने देखा, एक हरा भरा गधा, आगे-आगे चल रहा है,
और
, पीछे पीछे, कमजोर सा कुम्हार घिसट रहा है
गधा
कभी अकड़ता, बिदकता, भागता,
कभी
बोझ पटकता, कभी मचलता जा रहा है
और
बेचारा कुम्हार, बोझ उसका सम्हालता,
गधे को मनाता, प्यार से पुचकारता जा रहा है

यह
देख, हम भी, यह सोच जोर से हँसने लगे,
क्या
ऐसे भी गधे और कुम्हार हो सकते हैं?
इतने
में, एक सज्जन बोले, आप क्यों हसतें हैं?
बाबू
जी, ऐसे नजारे तो, यहाँ हर रोज दिखते हैं
मैंने
कहा, साहेब, आप ने भले इसे हर रोज देखा,
पर
जो मुझे दिखा, क्या आप उसे देख पा रहें हैं?

कुम्हार सोचता हैं, वो मालिक बन गधे को नचाता है,
पर
वास्तव में, गधा ही उसे नाकों चने चबवाता है
गली
के नेता की तरह, कुम्हार पर अकड़ दिखाता है,
और
बिना बात के, मनमर्जी से अड़ने का मुद्दा बनाता है।।
उसकी औकात याद दिलाने को, जो लाठी उठाओ तो,
पलट
-कर, कुम्हार पर, दुल्लती का जमकर, प्रयोग करता है
और
कभी, मिन्नत-जी-हुजूरी भी जी भर करवाता है,
पर, काम के समय, अपना पिछवाड़ा दिखाकर चल देता है।।

गधा
बड़े काम की चीज़ है, रोजगार की चीज़ है,
यह
सोच, कुम्हार, ख़ुद भूँखा रह, उसे भरपेट खिलाता है
और
यह वैशाख-नंदन, कुम्हार की हरी घांस खा,
आराम
से पसर, जमीन पर, लोट पर लोट लगाता है
और
जब, कुम्हार काम हेतु इसे लादना चाहे, तो,
भागता
है सब आलस्य तज , और हाथ नहीं आता है

अपनी इन सारी संवैधानिक हरकतों से, ये गधा हमें,
देश के परम पूज्य नेताओं की बरबस याद दिलाता है
क्या
कहें, हमें लगता है, इन पूज्य महानुभाव का,
नेता-गिरी से पूर्व-जनम का बड़ा ही गहरा नाता है

कुम्हार की तरह, हम भी नादान हैं, सोचते हैं,
गणतंत्र में, मतों-वोटों से, हम ही देश चला रहें हैं
पर
हकीकत में, देश को भी, गधे ही चलाते हैं,
और
हम, कुम्हार बन, आँख मूंदे पीछे पीछे चल रहे हैं

कुम्हार जैसे हम भी सोचतें हैं, देश का बोझ इन पर लाद देंगे,
जब तक यह उसे उठाएगा, हम सुख शान्ति से आराम करेंगे।
हर जानवर की तरह, यह भी सही रास्ता पकड़ कर चलेगा,
और हम पीछे पीछे, उंघते उंघते ही सही, पर मंजिल पर पहुचेंगे॥

और दिन-रात, गधे से उपेक्षा-अन्याय की दुलत्ती खाते हैं,
फिर भी, उसके
भ्रष्ट-आचार को, "चलता है" कह, झेल रहें हैं
उसपर से हम
, उसे हरा भरा रखने में, कोई कसर ना छोड़ रहें हैं,
और ख़ुद
, दो जून की रोटी और मूलभूत सुविधाओं को तरस रहें हैं ॥

अरे, गधे तो हम हैं, कभी कोई सबक ना सीखते हैं,
सालों
से सब देख-सहकर भी, उन्हें ही फिर सत्ता सौपतें हैं
हम
खड़े खड़े, उस कुम्हार की तरह, हर रोज ठगे जाते हैं,
और
यह हरे भरे गधे, देश को अपनी बपौती बना, चरते जाते हैं
और यह हरे भरे गधे, देश को अपनी बपौती बना, चरते जाते हैं

~जयंत चौधरी
स्व-रचित, जनवरी २८, २००९

(दुखी होकर मन ने एक व्यंग को जनम दिया.. पिता जी ने एक कविता लिखी थी, उससे प्रेरणा मिली इसकी..)
Picture courtesy siciliandonkeys.com

15 comments:

Jayant Chaudhary said...

कुछ चंद शेष ईमानदार और देशप्रेमी नेताओं से क्षमा याचना सहित यह व्यंग प्रस्तुत है अधिकाँश नेताओं और भारत की आम जनता (कुम्हार) की दशा पर...

~जयंत चौधरी
एक सच्चा देशप्रेमी.

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाहवा अच्छी rachna आपको बधाई

Anonymous said...

Keep it up...
Nice.

Anonymous said...

Waah wah. maja aa gayaa.

neeshoo said...

पहली बार आपको पढ़ा । शीर्षक आकर्षक लगा था देख कर । बाकी का काम आप ने लेखनी से कर दिया । सुन्दर

संगीता पुरी said...

वाह !! बहुत सुंदर रचना ...

mark rai said...

kaphi badhiya sir.....badhai ho ..

बवाल said...

अति उत्तम जयंत भाई।

"मुकुल:प्रस्तोता:बावरे फकीरा " said...

JAYANT BHAAI
SHUKRIYAA DO EK DIN SE BHAAREE
MOUKE MIL RAHE HAI INASE MILANE KE

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

अरे, गधे तो हम हैं, कभी कोई सबक ना सीखते हैं
हम खड़े खड़े, कुम्हार की तरह, हर रोज ठगे जाते हैं.

भई जयन्त जी, थोडी कन्फयूजन है.....कृ्प्या इतना स्पष्ट कर दें कि हम अपने आप को गधा समझें या कुम्हार....))

Anil Pusadkar said...

बहुत बढिया। अगर हो सके तो वर्ड वेरिफ़िकेशन का टैग हटा दें,उससे कमेण्ट करने मे आसानी होगी।

Jayant Chaudhary said...

पंडित डी के शर्मा जी,

धन्यवाद इसे पढ़ने और इस टिपण्णी के लिए।

हम ठगे तो कुम्हार (आम आदमी) की तरह जाते हैं, और गधे इसलिए हैं क्योंकि कुछ सीखते नहीं हैं।

"अरे, गधे तो हम हैं, कभी कोई सबक ना सीखते हैं॥"
इस जगह पर गधे को गाली की तरह (मंद-बुद्धि) उपयोग किया है।
और विरोधाभास (कुम्हार से गधा) से नई संज्ञा देने का प्रयास है।
आशा करता हूँ अब स्पष्ठ हो गया होगा।

~जयंत

Jayant Chaudhary said...

प्रिय अनिल जी,
पढ़ने और सुझाव के लिए धन्यवाद्, मैंने वोह काम कर दिया है.
~जयंत

अविनाश वाचस्पति said...

जयंत जी ऐसी रचनाओं का न हो अंत

और जिनसे आप क्षमा याचना कर रहे हैं

वे गधे नहीं घोड़े हैं

इसीलिए थोड़े हैं।


गधे सिर्फ गधे नहीं

ठन ठन गधे हैं

चुनावों में बन ठन तने हैं

चुनाव बाद टनाटन गधे हो जाएंगे

टनाटन से भरपूर नोटों में लोट लगाएंगे।

अल्पना वर्मा said...

Bahut hi badhiya vyangy kiya hai--gadhey aur kumhaar ke madhyam se...

samayik rachna..aaj kal chunavi mahol mein voters ko neend se jagane wali kavita..

sundar rachna hetu badhayee

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