Sunday, May 4, 2008

* जीवन है एक संग्राम *


जीवन है एक संग्राम,

नहीं करना तू इसमें विश्राम॥

मिलती नहीं सफलता इसमें,

बिना कभी कठोर परिश्रम॥

राह किसी की क्यों देखे,

राह बना ले तू स्वयम॥

रूकना नहीं, थकना नहीं,

चलते रहना तू अविराम॥

कर्म नितदिन करते रहना,

चाहे कुछ भी हो परिणाम

तब कर लेना तू विश्राम,

जब लग जाए जीवन में पूर्ण विराम।

*पूर्ण विराम = जीवन का अंत।

~जयंत चौधरी

एक छोटी सी कविता लिखी थी ऐरो-प्लेन में जब कनाडा से लौट रहा था। मई २००८

2 comments:

राजकुमारी said...

बहुत अच्छी कविता है ,

रंजना said...

वाह !!! अतिसुन्दर शिक्षाप्रद रचना....

कर्म का मार्ग ही लक्ष्य होना चाहिए...विराम तक अविराम चलते रहने में ही जीवन की सार्थकता है...

आभार...

Blogvani

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