Monday, March 9, 2009

कबीर दास जी दोहे

कबीरा गर्व ना कीजिये, कबहूँ ना हंसिये कोय,
अजहूँ नाव समुद्र में, क्या जाने क्या होए||

जिस घट प्रीत ना प्रेम रस, उन्ही रसना नहीं राम,
ते नर इस संसार में, उपजी भये बेकाम ||
(Those who do not have love and compassion in their heart,
can not have God in their heart. Those men have wasted their
lives after coming to this world.)

ज्यों तिल माही तेल है, ज्यों चकमक में आग,
तेरा साईं तुझ में है, जाग सके तो जाग ||

जहां दया तहां धर्म है, जहां लोभ वहाँ पाप,
जहां क्रोध तहां काल है, जहां क्षमा वहाँ आप ||
( आप = भगवान्)

कबीरा संगति साधू की, ज्यों गंधी की बास,
जो कछु गंधी दे नहीं, तो भी बास सुवास ||
(गंधी = perfumery, बास = fragrance)

जो घट प्रेम ना संचरे, सो घट जान मसान,
जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिन प्रान ||
(खाल = equipment used by blacksmith to blow air)

जात ना पूछिये साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ||

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होए,
यह आपा को टाल दे, दया करे सब कोए ||
(आपा = क्रोध)

~ कबीर दास जी

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