Tuesday, March 10, 2009

मन्दिर में आके भी ना तोड़ा

मन्दिर में आके भी ना तोड़ा, तुने मायाजाल,
समझ ना आए हुआ ये कैसे, मानव तेरा हाल।

जहाँ भी देखा पाई माया, कोई भी हो काल,
इस जीवन से गयी ना माया, हुए करोड़ो साल।
मन्दिर में आके भी.....

जिसके पीछे भटक रहा तू, हो करके बेहाल,
छोड़ के इक दिन जायेगी ये, होगा तू कंगाल।
मन्दिर में आके भी.....

मोह माया का तंत्र है प्राणी, व्यापक और विशाल,
इसने अपना जाल बिछाया, अम्बर से पाताल।
मन्दिर में आके भी .....

देर नहीं है अब भी प्राणी, नाच प्रभु की ताल,
सब पापों से तुझे बचाए, प्रभु नाम की ढाल।
मन्दिर में आके भी.....

~जयंत चौधरी
(स्व-रचित : ०८ फरवरी २००९)

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