Wednesday, November 5, 2008

मानवता

विगत केवल बीता हुआ समय नहीं होता, वरन आने वाले भविष्य की आधार-शिला होता है।
इतिहास के जो क्षण असीम वेदनापूर्ण और दुखद होते हैं, उनसे ही एक नए भविष्य का जनम होता है।
एक सुनहरा भविष्य, मानव के असीम विश्वास और आशा का;
एक सुनहरा भविष्य, सृष्टि के निरंतर चलन और आगामी पीढियों का;
एक सुनहरा भविष्य, आपसी भरोसे और प्रेम का, मानवता की विजय का;

इस सृष्टि में हर दुर्भाग्यपूर्ण पल में एक बीज छुपा होता है, जो आने वाले समय में विकसित होकर परिवर्तन का वट-वृक्ष बन जाता है। तत्कालीन परिस्थितियों के कारण कभी यह वृक्ष धीरे तो कभी शीघ्र वृद्धि करता है। और कभी पूर्ण विकास के पहले ही अन्तकाल में पहुँच जाता है, किंतु क्षय होने से पहले एक और बीज बो जाता है, जो कालांतर में परिस्कृत होकर उत्तम परिवर्तन लाता है।

मानव इतिहास में परिवर्तन पीडा, अशांति और अवनति का भी कारण रहा है। जिस प्रकार प्रकृति में स्थानीय परिस्थितियों के कारण पौधे और प्राणी स्वभाव परिवर्तित कर लेते हैं, ठीक उसी तरह, कुछ परिवर्तन के वट-वृक्ष विकसित होते हुए कटीलें बन जाते हैं। प्रेम, विश्वास, एकता, शान्ति और समानता की छाया और सुख-सम्रद्धि के मीठे फलों की जगह हिंसा, भेदभाव, लालच और पीड़ा के कांटे और जहरीले फल देते हैं। देशों, धर्मों और सभ्यताओं के टकराव इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। इस सुंदर संसार में अनेकों घ्रणित घटनाएँ हुयी हैं जिनके चिन्ह आज भी दिखातें हैं।

किंतु काल-चक्र के सन्मुख कुछ भी अनश्वर नहीं है, और प्राक्रतिक-परिवर्तन के नियम के आधीन होकर, नए सकारात्मक परिवर्तन के वट-वृक्ष विकसित होकर मानवता को सहारा देते हैं।
एक नया सवेरा आता है, और आशा की नई किरणों से मानवता में प्रकाश फैलाता है। एक बार पुनः, निराशा, नकारात्मकता और बुराइयों का अँधेरा पराजित हो जाता है, और अंत में विजयी होती है... मानवता।

एक ऐसा ही सूर्योदय आज पृथ्वी पर द्रष्टिगोचर हो रहा है.... और फिर एक बार मानवता विजयी हो रही है।

~जयंत चौधरी
0५/११/२००८

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