Monday, September 8, 2008

शहीद भगत सिंह (नवीनतम) भाग - १

भूमिका:

मैं हूँ बटुकेश्वर दत्त...
मैंने वही हूँ जिसने भारत की आज़ादी के लिए भगत सिंघ, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु और सुखदेव जैसे वीरों और देश-प्रेमियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर फिरंगिओं से लड़ाई की थी॥ एक दिन हमने पंजाब असेम्बली में धमाका कर ब्रितानी हुकूमत की नींव को हिला दिया था॥ परवाह नहीं थी हमें अपनी... सिर्फ़ एक ही चाह थी, वतन और हमवतन लोगों की आज़ादी॥
(भावुक होकर)
वोह एक और समय था... आज कुछ और समय है॥
आज़ादी से लेकर आज तक, देश की हालत कैसे बदल गई है। हम भारत वासियों की भावना भी कैसे बदल गई है॥ वो जज्बा, वो जूनून जो देश पर, अपने वतन पर मर-मिटने और उसके लिए कुछ करने का था, आज सिर्फ़ अपने तक सिमट कर रह गया है...
आज के हालत देख कर आपको उन दिनों के बारे में बताने का मन करता है॥
आज भी मुझे याद है... भगत कैसे गाता था....
मैं वहां था उस समय भी....

द्रश्य १:

(भगत सिंघ एक बेंच पर बैठे हैं, भावावेश में ... गाते हुए.... "मेरा रंग दे ... और फिर राजगुरु और दत्त आते हैं )
दा : भगत.... क्या हुआ? आप इतने बेचैन से क्यों गा रहे हैं??
भ: (ध्यान हटा कर) आइये....राजगुरु और बटुकेश्वर भाई...
मुझे आज जलियांवाला बाग़ याद आ गया...
दा: (भाव में) उसे कोई कैसे भूल सकता है॥ फिरंगियों ने नर संहार का जो खुनी खेल खेला था वोह सदियों तक जनता भुला नहीं पाएगी।
भ: सैकड़ों निहत्थे लोगों को, जो शान्ति से भाषण सुन रहे थे, जनरल दायर ने घेर कर गोलियों से भून डाला। एक हज़ार छः सौ से ज्यादा गोलियों चली॥ औरतों, बच्चों, बूढों को भी नहीं छोडा॥
रा : (दुःख से) वोह कह रहा था "भीड़ पर गोली चलाओ, उन्हें मारो, सबक सिखाओ"... खून की नदियाँ बह गई...
दा: कोई चेतावनी नहीं दी गई। बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद कर दिए गए थे। भागते हुए लोगों, मरते हुए बूढों, माताओं, बच्चों की चीताकारें आज भी गूंजती हैं॥
भ: (क्रोध में) मैं पूछता हूँ, क्या गलती थी उनकी?? सिर्फ़ यह की वो परतंत्र बन कर नहीं रह सकते थे? अपनी मातृभूमि पर उस विदेशी सरकार को बर्दाश्त नहीं कर सकते जो सिर्फ़ हमारा खून चूस कर अपना खजाना भर रही है??
(जोश में जाकर एक बोतल लातें हैं जिसमें खून से सनी मिटटी है) यह मिटटी मैंने जलियांवाला बाग़ से उठायी थी॥ इसकी कसम ली थी की जो खून बहा वोह व्यर्थ नहीं जायेगा। उन मासूमों की आवाजें हमेशा याद दिलाएंगी हमारा कर्तव्य क्या है॥ वो आवाजें भारतवासियों की सोई आत्मा को jhinjhod के उठाएगी और उसे मजबूर करेंगी गुलामी की जंजीरें काटने के लिए।
(गुस्से में)... जो खून वहाँ बहा, वोह ऐसा सैलाब लाएगा जो फिरंगी सरकार को बहा ले जायेगा। वो खून भरी मिटटी भारत की मजबूत नींव बनेगी...
रा : (दुःख से) हमारे देश की नींव?..... कैसे बनेगी यह मजबूत?? पूरे देश में बटवारे के बीज बोए जा रहे हैं... नफरत की आग को बढाया जा रहा है।
दा: फिर यह फिरंगी हमारी आपसी लडाई का फायदा उठायेंगे... यह हमें आज तो आज, कल भी एक नहीं होने देंगे। हमारी एकता इनकी सबसे बड़ी दुश्मन है।
भ: (क्रोध में) इन फिरंगियों की यह वर्षों पुरानी चाल है। फ़ुट डालो और राज करो, की नीति से इन्होने पुराने राजाओ को आपस में लड़वाया, और अपना राज बढाया। धीरे इन फिरंगियों ने सारे भारत को निगल लिया।
रा : यही तो दुःख की बात है। आज भी कहीं धर्म के नाम पर, तो कहीं जात के नाम पर हमारे दुश्मन हमारी कमजोरी का फायदा उठाते हैं।
दा: (जोश में) हमारी "नौजवान भारतीय सभा" ऐसे लोगों का संगठन है जिनके लिए के धर्म, जात, भाषा की विभिन्नता कोई मायने नहीं रखती, हम सब सबसे पहले सिर्फ़ भारतीय हैं, बाकी बाद में।
भ: (जोश में लेकिन गंभीरता से) जी हाँ, हम सब भारतीय एक हैं। हम इसी मिटटी से बने हैं, इसी पर पले, इसका अन्न खाकर बड़े हुए, और एक दिन, इसी मिटटी के लिए हंसते हंसते मिट जायेंगे।
दा : अपनी जनम भूमि पर सब कुछ लुटा देना ही सर्वोत्तम कर्म है।
रा : मित्रां, हमारे कर्मों से भारत माँ की विजय होगी।
भ: और उस दिन के लिए हम बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं... (शांत हो कर) अब चलिए हमें बाकी क्रांतिकारी साथियों से मुलाक़ात करनी है...

(सब साथ साथ निकल जाते हैं...)

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