Monday, January 28, 2008

जाते जाते (एक कविता)

ना आरंभ में, और ना अंत में....
जीवन का अर्थ है, बस इनके अंतर में...
ना कुछ लाये थे हम, ना कुछ ले जायेंगे...
जाते जाते अपने कर्मों की, अमिट छाप छोड़ते जायेंगे....

माँ के आँचल में, या तरुवर की ठंडी छाव में....
वर्षा की बूंदों में, या कोयल की सुरीली तान में....
जो सुख मिलता है हमें, वह सुख सबको दे जायेंगे...
जीवन की तपती मरुभूमि पर, अमृत रस बरसायेंगे...
जाते जाते अपने कर्मों की, अमिट छाप छोड़ते जायेंगे....

स्व-रचित
- जयंत चौधरी (मार्च २६, २००७)

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