Wednesday, November 5, 2008

मानवता

विगत केवल बीता हुआ समय नहीं होता, वरन आने वाले भविष्य की आधार-शिला होता है।
इतिहास के जो क्षण असीम वेदनापूर्ण और दुखद होते हैं, उनसे ही एक नए भविष्य का जनम होता है।
एक सुनहरा भविष्य, मानव के असीम विश्वास और आशा का;
एक सुनहरा भविष्य, सृष्टि के निरंतर चलन और आगामी पीढियों का;
एक सुनहरा भविष्य, आपसी भरोसे और प्रेम का, मानवता की विजय का;

इस सृष्टि में हर दुर्भाग्यपूर्ण पल में एक बीज छुपा होता है, जो आने वाले समय में विकसित होकर परिवर्तन का वट-वृक्ष बन जाता है। तत्कालीन परिस्थितियों के कारण कभी यह वृक्ष धीरे तो कभी शीघ्र वृद्धि करता है। और कभी पूर्ण विकास के पहले ही अन्तकाल में पहुँच जाता है, किंतु क्षय होने से पहले एक और बीज बो जाता है, जो कालांतर में परिस्कृत होकर उत्तम परिवर्तन लाता है।

मानव इतिहास में परिवर्तन पीडा, अशांति और अवनति का भी कारण रहा है। जिस प्रकार प्रकृति में स्थानीय परिस्थितियों के कारण पौधे और प्राणी स्वभाव परिवर्तित कर लेते हैं, ठीक उसी तरह, कुछ परिवर्तन के वट-वृक्ष विकसित होते हुए कटीलें बन जाते हैं। प्रेम, विश्वास, एकता, शान्ति और समानता की छाया और सुख-सम्रद्धि के मीठे फलों की जगह हिंसा, भेदभाव, लालच और पीड़ा के कांटे और जहरीले फल देते हैं। देशों, धर्मों और सभ्यताओं के टकराव इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। इस सुंदर संसार में अनेकों घ्रणित घटनाएँ हुयी हैं जिनके चिन्ह आज भी दिखातें हैं।

किंतु काल-चक्र के सन्मुख कुछ भी अनश्वर नहीं है, और प्राक्रतिक-परिवर्तन के नियम के आधीन होकर, नए सकारात्मक परिवर्तन के वट-वृक्ष विकसित होकर मानवता को सहारा देते हैं।
एक नया सवेरा आता है, और आशा की नई किरणों से मानवता में प्रकाश फैलाता है। एक बार पुनः, निराशा, नकारात्मकता और बुराइयों का अँधेरा पराजित हो जाता है, और अंत में विजयी होती है... मानवता।

एक ऐसा ही सूर्योदय आज पृथ्वी पर द्रष्टिगोचर हो रहा है.... और फिर एक बार मानवता विजयी हो रही है।

~जयंत चौधरी
0५/११/२००८

Monday, September 8, 2008

शहीद भगत सिंह (नवीनतम) भाग - १

भूमिका:

मैं हूँ बटुकेश्वर दत्त...
मैंने वही हूँ जिसने भारत की आज़ादी के लिए भगत सिंघ, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु और सुखदेव जैसे वीरों और देश-प्रेमियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर फिरंगिओं से लड़ाई की थी॥ एक दिन हमने पंजाब असेम्बली में धमाका कर ब्रितानी हुकूमत की नींव को हिला दिया था॥ परवाह नहीं थी हमें अपनी... सिर्फ़ एक ही चाह थी, वतन और हमवतन लोगों की आज़ादी॥
(भावुक होकर)
वोह एक और समय था... आज कुछ और समय है॥
आज़ादी से लेकर आज तक, देश की हालत कैसे बदल गई है। हम भारत वासियों की भावना भी कैसे बदल गई है॥ वो जज्बा, वो जूनून जो देश पर, अपने वतन पर मर-मिटने और उसके लिए कुछ करने का था, आज सिर्फ़ अपने तक सिमट कर रह गया है...
आज के हालत देख कर आपको उन दिनों के बारे में बताने का मन करता है॥
आज भी मुझे याद है... भगत कैसे गाता था....
मैं वहां था उस समय भी....

द्रश्य १:

(भगत सिंघ एक बेंच पर बैठे हैं, भावावेश में ... गाते हुए.... "मेरा रंग दे ... और फिर राजगुरु और दत्त आते हैं )
दा : भगत.... क्या हुआ? आप इतने बेचैन से क्यों गा रहे हैं??
भ: (ध्यान हटा कर) आइये....राजगुरु और बटुकेश्वर भाई...
मुझे आज जलियांवाला बाग़ याद आ गया...
दा: (भाव में) उसे कोई कैसे भूल सकता है॥ फिरंगियों ने नर संहार का जो खुनी खेल खेला था वोह सदियों तक जनता भुला नहीं पाएगी।
भ: सैकड़ों निहत्थे लोगों को, जो शान्ति से भाषण सुन रहे थे, जनरल दायर ने घेर कर गोलियों से भून डाला। एक हज़ार छः सौ से ज्यादा गोलियों चली॥ औरतों, बच्चों, बूढों को भी नहीं छोडा॥
रा : (दुःख से) वोह कह रहा था "भीड़ पर गोली चलाओ, उन्हें मारो, सबक सिखाओ"... खून की नदियाँ बह गई...
दा: कोई चेतावनी नहीं दी गई। बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद कर दिए गए थे। भागते हुए लोगों, मरते हुए बूढों, माताओं, बच्चों की चीताकारें आज भी गूंजती हैं॥
भ: (क्रोध में) मैं पूछता हूँ, क्या गलती थी उनकी?? सिर्फ़ यह की वो परतंत्र बन कर नहीं रह सकते थे? अपनी मातृभूमि पर उस विदेशी सरकार को बर्दाश्त नहीं कर सकते जो सिर्फ़ हमारा खून चूस कर अपना खजाना भर रही है??
(जोश में जाकर एक बोतल लातें हैं जिसमें खून से सनी मिटटी है) यह मिटटी मैंने जलियांवाला बाग़ से उठायी थी॥ इसकी कसम ली थी की जो खून बहा वोह व्यर्थ नहीं जायेगा। उन मासूमों की आवाजें हमेशा याद दिलाएंगी हमारा कर्तव्य क्या है॥ वो आवाजें भारतवासियों की सोई आत्मा को jhinjhod के उठाएगी और उसे मजबूर करेंगी गुलामी की जंजीरें काटने के लिए।
(गुस्से में)... जो खून वहाँ बहा, वोह ऐसा सैलाब लाएगा जो फिरंगी सरकार को बहा ले जायेगा। वो खून भरी मिटटी भारत की मजबूत नींव बनेगी...
रा : (दुःख से) हमारे देश की नींव?..... कैसे बनेगी यह मजबूत?? पूरे देश में बटवारे के बीज बोए जा रहे हैं... नफरत की आग को बढाया जा रहा है।
दा: फिर यह फिरंगी हमारी आपसी लडाई का फायदा उठायेंगे... यह हमें आज तो आज, कल भी एक नहीं होने देंगे। हमारी एकता इनकी सबसे बड़ी दुश्मन है।
भ: (क्रोध में) इन फिरंगियों की यह वर्षों पुरानी चाल है। फ़ुट डालो और राज करो, की नीति से इन्होने पुराने राजाओ को आपस में लड़वाया, और अपना राज बढाया। धीरे इन फिरंगियों ने सारे भारत को निगल लिया।
रा : यही तो दुःख की बात है। आज भी कहीं धर्म के नाम पर, तो कहीं जात के नाम पर हमारे दुश्मन हमारी कमजोरी का फायदा उठाते हैं।
दा: (जोश में) हमारी "नौजवान भारतीय सभा" ऐसे लोगों का संगठन है जिनके लिए के धर्म, जात, भाषा की विभिन्नता कोई मायने नहीं रखती, हम सब सबसे पहले सिर्फ़ भारतीय हैं, बाकी बाद में।
भ: (जोश में लेकिन गंभीरता से) जी हाँ, हम सब भारतीय एक हैं। हम इसी मिटटी से बने हैं, इसी पर पले, इसका अन्न खाकर बड़े हुए, और एक दिन, इसी मिटटी के लिए हंसते हंसते मिट जायेंगे।
दा : अपनी जनम भूमि पर सब कुछ लुटा देना ही सर्वोत्तम कर्म है।
रा : मित्रां, हमारे कर्मों से भारत माँ की विजय होगी।
भ: और उस दिन के लिए हम बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं... (शांत हो कर) अब चलिए हमें बाकी क्रांतिकारी साथियों से मुलाक़ात करनी है...

(सब साथ साथ निकल जाते हैं...)

Sunday, August 24, 2008

भगत सिंघ (नया) भाग-१

भूमिका:

मैं हूँ बटुकेश्वर दत्त...
मैंने वही हूँ जिसने भारत की आज़ादी के लिए भगत सिंघ, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु और सुखदेव जैसे वीरों और देश-प्रेमियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर फिरंगिओं से लड़ाई की थी॥ एक दिन हमने पंजाब असेम्बली में धमाका कर ब्रितानी हुकूमत की नींव को हिला दिया था॥ परवाह नहीं थी हमें अपनी... सिर्फ़ एक ही चाह थी, वतन और हमवतन लोगों की आज़ादी॥
(भावुक होकर)
वोह एक और समय था... आज कुछ और समय है॥
आज़ादी से लेकर आज तक, देश की हालत कैसे बदल गई है। हम भारत वासियों की भावना भी कैसे बदल गई है॥ वो जज्बा, वो जूनून जो देश पर, अपने वतन पर मर-मिटने और उसके लिए कुछ करने का था, आज सिर्फ़ अपने तक सिमट कर रह गया है...
आज के हालत देख कर आपको उन दिनों के बारे में बताने का मन करता है॥
आज भी मुझे याद है... भगत कैसे गाता था....
मैं वहां था उस समय भी....

द्रश्य १:
(भगत सिंघ एक बेंच पर बैठे हैं, भावावेश में ... गाते हुए.... "मेरा रंग दे ... बसंती चोला... मेरा रंग दे.." और फिर राजगुरु और दत्त आते हैं ... भ = भगत सिंह, दा = बटुकेश्वर दत्त, रा = राजगुरु)

दा : भगत.... क्या हुआ? आप इतने बेचैन से क्यों गा रहे हैं??
भ: (ध्यान हटा कर) आइये... राजगुरु और बटुकेश्वर भाई...
मुझे आज जलियांवाला बाग़ याद आ गया...
दा: (भाव में) उसे कोई कैसे भूल सकता है॥ फिरंगियों ने नर संहार का जो खुनी खेल खेला था वोह सदियों तक जनता भुला नहीं पाएगी।
भ: सैकड़ों निहत्थे लोगों को, जो शान्ति से भाषण सुन रहे थे, जनरल दायर ने घेर कर गोलियों से भून डाला। औरतों, बच्चों, बूढों को भी नहीं छोडा॥
रा : (दुःख से) लोगों ने अपने कानों से सुना था वो कह रहा था "भीड़ पर गोली चलाओ, उन्हें मारो, सबक सिखाओ"... खून की नदियाँ बह गई...
दा: कोई चेतावनी नहीं दी गई। बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद कर दिए गए थे। भागते हुए लोगों, मरते हुए बूढों, माताओं, बच्चों की चीताकारें आज भी गूंजती हैं॥
: (क्रोध में) मैं पूछता हूँ, क्या गलती थी उनकी?? सिर्फ़ यह की वो परतंत्र बन कर नहीं रह सकते थे? अपनी मातृभूमि पर उस विदेशी सरकार को बर्दाश्त नहीं कर सकते जो सिर्फ़ हमारा खून चूस कर अपना खजाना भर रही है??
(जोश में जाकर एक बोतल लातें हैं जिसमें खून से सनी मिटटी है) यह मिटटी मैंने जलियांवाला बाग़ से उठायी थी॥ इसकी कसम ली थी की जो खून बहा वोह व्यर्थ नहीं जायेगा। उन मासूमों की आवाजें हमेशा याद दिलाएंगी हमारा कर्तव्य क्या है॥ वो आवाजें भारतवासियों की सोई आत्मा को झिंझोड़ के उठाएगी और उसे मजबूर करेंगी गुलामी की जंजीरें काटने के लिए।
(गुस्से में)... जो खून वहाँ बहा, वोह ऐसा सैलाब लाएगा जो फिरंगी सरकार को बहा ले जायेगा। वो खून भरी मिटटी भारत की मजबूत नींव बनेगी...
रा : (दुःख से) हमारे देश की नींव?..... कैसे बनेगी यह मजबूत?? पूरे देश में बटवारे के बीज बोए जा रहे हैं... नफरत की आग को बढाया जा रहा है।
दा: फिर यह फिरंगी हमारी आपसी लडाई का फायदा उठायेंगे... यह हमें आज तो आज, कल भी एक नहीं होने देंगे। हमारी एकता इनकी सबसे बड़ी दुश्मन है।
: (क्रोध में) इन फिरंगियों की यह वर्षों पुरानी चाल है। फ़ुट डालो और राज करो, यह तो इनकी नीति है। इसी तरह से इन्होने पुराने राजा और रजवाडों को आपस में लड़वाया, उनकी आपसी लड़ाई का फायदा उठाया। धीरे धीरे इन फिरंगियों ने सारे भारत को निगल लिया।
रा : यही तो दुःख की बात है। आज भी इसी "फ़ुट डालो, और राज करो" का सहारा ले रहे हैं। कहीं धर्म के नाम पर, तो कहीं जात के नाम पर ये साम्राज्य वादी सरकार हमारी कमजोरी का फायदा उठाना चाहती है।
दा: (जोश में) लेकिन, अब वोह बात नहीं, हम सब जागरूक हो गए हैं। हमारी "नौजवान भारतीय सभा" ऐसे लोगों का संगठन है जोह जानते हैं के धर्म, जात, भाषा की विभिन्नता कोई मायने नहीं रखती, हम सब सबसे पहले सिर्फ़ भारतीय हैं, बाकी बाद में।
: (जोश में लेकिन गंभीरता से) हम सब भारतीय एक हैं। हम इसी मिटटी से बने हैं,इसी मिटटी पर पले, इसी मिटटी का अन्न खाकर बड़े हुए, इसी मिटटी पर एक दिन, इसी मिटटी के लिए हंसते हंसते मिट जायेंगे।
दा : ईश्वर करे ऐसा ही हो। अपने देश पर सब कुछ लुटा देना ही सर्वोत्तम कर्म है।
रा : मित्रां, इसी लिए तो हम सब साथ हैं..... भारत माँ की विजय होगी और फिरंगियों की पराजय॥
: ऐसा ही होगा... (जोश में) और उस दिन के लिए हम बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं... (शांत हो कर) अब चलिए हमें बाकी क्रांतिकारी साथियों से मुलाक़ात करनी है...

(ऐसा कहकर वो सबको लेकर निकल पड़ते हैं....)

Sunday, August 10, 2008

मातृभूमि (मूवी)

I am not so sure if the movie and director is so brilliant as it has been painted by many.

While watching it, I was initially liking it in the sense of its basic theme (female infanticide), until the scene of father crying out "what about me?".

Now, that was the nadir of the movie.

In one single shot the movie was brought down from it's glorious heights to abyss of "shock-factor". There was NO need to have such a scene. That scene and others with father being involved with daughter-in-law were written and directed to serve only one purpose, to add more shock and disgust.

Excess of anything is harmful like "ati sarvtra varjvet". That is where my disenchantment and indigestion with the movie begin.

Granted that young sons were desperate as many men of their generation for marriage and ultimately for sexual pleasure. But shortage of women had nothing to do with father trying to get his share. Even in today's world there are plenty of widowed fathers who take care of their children alone without remarrying. Their choice of not marrying again is not altered by availability (or unavailability) of marriageable women. Therefore, the acute shortage does NOT alter the behavior of widowed fathers and therefore, this part of the film was useless for everything other than shock value.

Another shocking thing was to show the 'domestic help' adding urine in the 'sharbat' for the priest. That was also a scene that could have been avoided.
While the director makes a valiant effort and take upon a great issue, he has fallen in the trap of adding more masaalaa (read shocking scenes), thus crossing the line that separates a great movie from not so great ones.

I really wish that this movie was without such scenes, then it would have been one of the best I had ever seen, at least in the sense of basic theme.

Sunday, May 4, 2008

* जीवन है एक संग्राम *


जीवन है एक संग्राम,

नहीं करना तू इसमें विश्राम॥

मिलती नहीं सफलता इसमें,

बिना कभी कठोर परिश्रम॥

राह किसी की क्यों देखे,

राह बना ले तू स्वयम॥

रूकना नहीं, थकना नहीं,

चलते रहना तू अविराम॥

कर्म नितदिन करते रहना,

चाहे कुछ भी हो परिणाम

तब कर लेना तू विश्राम,

जब लग जाए जीवन में पूर्ण विराम।

*पूर्ण विराम = जीवन का अंत।

~जयंत चौधरी

एक छोटी सी कविता लिखी थी ऐरो-प्लेन में जब कनाडा से लौट रहा था। मई २००८

Wednesday, January 30, 2008

कर्तव्य (Poora)

पात्र
===
- माँ
- बेटा मेजर बत्रा
- बेटी कविता
- पिता जी (नाटक में नहीं दिखाया है)
- कैप्टन मूर्ति
- कर्नल गर्ग

द्रश्य १
====

(मेजर बैठे है एक टेंट के सामने कुछ पढ़ रहें हैं। उनका मित्र कैप्टन मूर्ति आता है।)
क - गुड मार्निंग सर, क्या कर रहें है?
म - आओ कैप्टन मूर्ति... और कितनी बार कहा है 'सर' मत बोला कर।
क - क्यों सर?? (सर पर थोडा जोर देता है)
म - सर सर बोल कर सर खा जाता है!!! (सर पकड़ लेटा है)
क - क्या सर.....
म - फिर सर॥
क - सॉरी सर (चेहरा बना कर)
म - तू ऐसे नहीं मानेगा... चल १० पुश-अप लगा। अभी (कड़क आवाज में)
क - (शुरू हो जाता है)
म - बस कर मैं तो मजाक कर रहा था।
क - अरे सर आप भी ना..... ओफ्फ्फ़ सॉरी सर ... मतलब सॉरी मेजर बत्रा (!!!)
म - (हसते हुए) अब बता कैसे आना हुआ।
क - (शरारत के साथ) चिट्ठी आयी है आई है... गर्ल-फ्रेंड कि चिठ्ठी आई है....
म - मैं और गर्ल-फ्रेंड !!!! इस लंगूर के हाथ में हूर??
क - हूर तो पता नहीं पर आप जरूर हो लंगूर...
(म चिठ्ठी छीन लेटा है, और बैठ के पढ़ता है)

म - (मुस्करा कर) माँ तू भी ना... फिर वोही...
क - क्या हुआ... अर्री आप के गाल तो लाल हो रहें हैं... अब तो आप सचमुच के लंगूर लग रहें हैं॥ वह लाल मुह वाले!!!
म - माँ फिर पीछे पड़ी है... शादी कर- शादी कर... अपनी पसंद से ही कर ले, बस कर ले॥ कोई भी चलेगी, बस तू खोज ले.
क - कोई भी... तो खोज लो ना॥
म - ज़रा चारों तरफ देख.... यहाँ कहाँ मिलेगी, यहाँ तो इंसान का नाम निशाँ नहीं है...
क - ह्म्म्म.... बंदरिया तो मिल सकती है yahaan, आप बन्दर जो हो॥ (म मुँह बनाता है)
म - अबे॥
क- लेकिन आपने तो अवसर गवां दिया... चिडिया तो उड़ गयी और अब आप जाल फैलाते हो।
म - चिडिया?? जाल?? क्या मतलब??
क - (कुहनी से मार कर) वह अपनी प्रीती... आयी थी ना और बोली थी "दिल से" "कभी अलविदा ना कहना"॥ कैसे कमर में हाथ दाल रही थी... मैंने सब देखा था पीछे से (विंक करता है)। बस उस समय हाथ पकड़ लेना था।
म - ह्म्म्म्म वह तो गयी॥ तू कहाँ था, तब बोला क्यों नहीं??
क - देखने में बिजी था॥ (विंक)
म - वैसे भी वह चिडिया तो इस बन्दर के हाथ नहीं आती
क - कहो तो और बुलवा?? प्रियंका, करीना यस्स्स्स्स्स्स विदया!!

(इस समय कमांडिंग अफसर आते हैं... दोनो खडे हो कर सैल्यूट करतें हैं)
कर - आराम से॥ लो बत्रा मैंने तुम्हारी समस्या हल कर दी है।
म - मैं समझा नहीं सर?
कर - मुझे मूर्ति ने सब बता दिया था। तुम्हे अपनी माँ कि बात मानना चाहिए।
क - पर सर वह॥
कर - (मूर्ति को चुप करा कर) रुको हमेशा बीच में बोलते हो#$# मैं बत्रा कि पोस्टिंग जबलपुर करा दी है।
क - वह मारा ना पापड़ वाले को!! याहू
कर - (गुस्से में) किसे?
म - सॉरी सर, उसे पता नहीं था कि आपके ससुर जी का नाम पापड़ वाला है।
क - माफ़ करिये सर।
कर - बेटा यदि सीमा पर नहीं होता ना तो इतनी छुट नहीं मिलती। खैर बत्रा मैंने तुम्हे १ महीने कि छुट्टी दे दी है। अब जा शादी कर के ही आना। और बिना शादी के लौटे तो सारे दिन रायफल सर पर उठा कर ground के चक्कर लगाते रहोगे॥ (मुस्कराता है)
म - (भावुक हो कर) सर..... मैं कैसे आपका धन्यवाद दूँ..... माँ और कविता कितनी प्रसन्न होंगी...
क - याहू!!!! (कर को देख कर) सॉरी सर, मैं बहुत खुश हूँ मेजर बत्रा के लिए।
कर - ठीक है... पर सिर्फ आज के लिए...
म - सर आपने आज ...
कर - तुम इसके अधिकारी हो॥ बहुत हुयी देश सेवा, ५ साल से यहाँ हो। अब घर जाओ माँ राह देखती होगी।
क - और धन्यवाद मेरा कहो, मैंने सर को तुम्हारी कहानी बताई थी.... अब आप भाभी जी के साथ नर्मदा में चादानी रात में नाव में ..... (मेजर उसे गले लगा कर चुप करा देता है)




द्रश्य २
=====

(माँ बैठी है घर पर... कुछ बुनती हुयी॥ कविता आती है गाते गाते )
कव - माँ ओ माँ ... माँ ओ माँ... (गाती है और उछलती है)
माँ - क्या हुआ, कुछ बोल तो॥
कव - माँ, भैया घर आ रहा है!!
माँ - (उठ कर, सामान गिर जाता है) मेरा लाल... मेरा लाल आ रहा है?? कब?
कव - कल ही... ओ माँ ५ साल बाद।
माँ - मैं तो उसे जी भर देख भी ना पायुंगी... आसूं जो आजायेंगे।
कव - ओ माँ तू उसे देखेगी भी और शादी भी करवाएगी।
माँ - क्या कहा तुने??
कव - हाँ माँ, वह शादी के लिए मान गया है। (हाथों कि मुठ्ठी बना कर, हवा में जोर से हिला कर)
माँ - हे भगवान्!!! इतनी सारी खुशियाँ।
कव - और सुनो... उसकी पोस्टिंग जबलपुर हो गयी है॥
माँ - अरे सम्हाल मुझे... मैं तो मारे ख़ुशी के बेहोश ना हो जाऊं। तेरे पिता जी सुनेंगे तो पता नहीं क्या कारेंगे। रामू कि दुकान से मीठा लेने जायेंगे, तेरे भैया को बहुत पसंद है ना।
कव - वह जब टूर से लौटेंगे तब उनको कितनी ख़ुशी होगी॥
माँ - अच्छा... सुन वह लड़कियों के फोटो वाला डिब्बा ले आ॥ मेरे लाल को दिखानी होगी॥ और कितने सारे काम करने हैं। लड्डू बनाने होंगे, नमकीन कि तैयारी करनी होगी। जल्दी कर... (जल्दी का भाव लाना है, हाथ चला कर)
कव - (गाती है ) माँ तू कितनी अच्छी है कितनी भोली है....
माँ - चल हट!

(कविता जाने लगाती है)( इतनी में मेजर बत्रा आ जाता है)
माँ - कविता!!!!
कव - क्या हुआ... भैया!!
म - (माँ के पाव छूता है)
माँ - यह मेरा लाल ही है ना...
म - हाँ माँ मैं ही हूँ (हसते हुए) मैं आ गया।
माँ - तू तो कल आने वाला था?
म - मुझे surprise देनाथा!!
माँ - एक दिन तू ऐसा surprise देगा कि...
कव - हाँ भैया हम कुछ तैयारी भी न कर सके।
म - क्यों आप लोगों को ख़ुशी नहीं है मेरे आने कि? (झूट में) तो मैं चला जाता हूँ।
कव - तू तो बुरा मान गया।
माँ - अरी तेरा भैया तो एक अभिनेता है, देख कैसे बुद्धू बना दिया तुझे।
म - (हसते हुए) हां हां बुद्धू को भी कोई बुद्धू बना सकता है?
कव - भैया!!!!! (नाखून दिखा कर) नोच लुंगी॥
म - (और हस कर) हां हां खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे!!!
क - माँ देखो ना (रोने ही वाली है)
माँ - (मेजर को) आते ही रुलाने लग जाता है।
म - (सकपका कर) अरे मैं तो मजाक कर रहा था.
कव - माँ, देखना एक दिन रुलाएगा।
माँ - अब बस कर॥ चल बेटा अब तू लड़की पसंद कर ले। कविता तू वह डिब्बा ले आ।
म - ठीक है माँ जैसा आप कहें।

कव - (डिब्बा देकर) यह लो माँ अब्द एक भाभी ढूँढ ही लेना। मैं चली चाय बना कर लाती हूँ....
(माँ और मेजर देखते हैं....)


म - माँ तू ही पसंद कर ले, मुझसे नहीं होता।
माँ - इतने वर्षों से कुछ ना कुछ बहाना, अब तो मैं ही ढूँढ लेटी हूँ। फिर मेरे लाल कि बारात निकलेगी, बहु आएगी, फिर नाती/नातिन... मैं तो नाचती फिरुंगी..... (सपनों में खो जाती है)॥

(इतने में फ़ोन कि घंटी बजती है। मेजर फ़ोन उठाता है।)
म - हैलो मेजर बत्रा बोल रहा हूँ
कर - (फ़ोन पर) मेजर बत्रा.... मेजर ध्यान से सुनो... इस समय हमारे देश पास युद्ध के बादल मंडरा रहें है। आज १ घंटे पहले ही हम पर आक्रमण हुआ है। सारी छुट्टियाँ रद्द कर दी गयीं है। तुम्हे इसी समय वापस आ कर रिपोर्ट करना है। मुझे खेद है कि तुम्हे इस समय फ़ोन करना पडा।
म - (चहरे पर भाव ला कर) सर॥ खेद कैसा यह तो मेरा सौभाग्य है कि मैं मात्रभूमि की सेवा कर सकूँगा। मैं भारत माँ का रक्षक हूँ और इस धरती के काम आऊँगा। मैं अभी रवाना होता हूँ सर। जय हिंद सर.
कर - जय हिंद।
(फ़ोन रखता है)
(इतने में कविता आ जाती है, चाय कि ट्रे लेकर)
माँ - (चिंता में) क्या हुआ??
म- माँ दुश्मनों ने आक्रमण कर दिया है। मुझे अभी जाना होगा।
क - भैया (टूटती आवाज में)... रूक जा थोडे दिन और सही...
म- पगली, मैं अभी गया और अभी आया॥ दुश्मनों को पता नहीं है किससे टकराएँ हैं। भारत माँ के सपूत हिमालय कि तरह अडिग हैं॥ सबक सीखा देंगे उन्हें..
माँ - (रुंधे गले से)बेटा, अभी तो मैंने घडी भर भी तुझे नहीं देखा है... पिता जी के आने तक रूक जा, वह कल ही आ जायेंगे।
म- माँ, मुझे मत रोक, भारत माँ ने मुझे बुलाया है। उसकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है, इस कर्तव्य से मैं पीछे नहीं हटूंगा।
(पीछे वंदे मातरम् शुरू होता है)
माँ - (कठोर बन कर) जा बेटा, तेरा कर्तव्य निभा कर आ।
(मेजर पाव छूकर आशीर्वाद लेटा है)
माँ - सदा विजयी हो।
कव - भैय हमें तुम पर गर्व है।
म - और मुझे आप सब पर। maa मैं वचन देता हूँ कि जल्दी लौटूंगा और तेरे सारे अरमान पूरे करूंगा। pita ji से कहना उनके वीरता के पाठ आज काम आएंगे। अब मैं जाता हूँ। जय हिंद.
(पीछे "कन्धों से मिलते हैं कंधे" शुरू होता है)






द्रश्य
====

(पीछे से गोलियों, बमों की आवाज रही हैसिर्फ मेजर और कैप्टन बचे हैंदोनो जमीन पर लेट कर फायरिंग कर रहें हैंदोनो घायल हैं.)
- मेजर बत्रा, हमारे सारे साथी शहीद हो चुके हैंगोलियाँ भी खतम होने को हैं
- और रेडियो भी नष्ट हो गया हैऔर बेस कैम्प खबर देना जरूरी है
- आप जाइए, मैंने इन लुटेरों को देख लेता हूँ
- (क्रोध में) कैप्टन मूर्ति मैं और पीठ दिखा दूँ... कभी नहीं
- आप कितनी बार लड़ चुके हैं, अब मेरे बारी है
- (हस कर) यह दिल मांगे मोर!!!!
- नो मोर सरआप जाइए मैं इन्हें रोकता हूँहमारे विश्वास का यह बदला
- तुम जाओअभी इसिस समयसमय बहुत कम है...
- मगर आप बहुत घायल हैं... आप जाइए... बेस कैम्प में डाक्टर ...
(उसे रोक कर)
- तुम अभी जाओयह मेरा आदेश है
- पर आप को इस हालत में छोड़ कर नहीं....
(उसे रोक कर)
- मैं तुम्हारा सीनियर ऑफिसर हमकर्नल साहेब यहाँ नहीं है तो मैं कमांडिंग ऑफिसर भी हूँयह मेरी कमांड है कैप्टन मूर्ति, अभी जाओ और मदद ले कर आओ... अब जाओ... (क्रोध में)
- (बहुत मुश्किल से)... अच्छा सरअपना ख्याल रखना...और उन्हें मजा चखा देना और कुछ को मेरे लिए भी छोड़ देना
- तू अभी भी सुधरेगा... (हस कर) तू हमेशा ऐसे ही रहनाअब जा
(कैप्टन जाता है)
- (गोली चलाते हुए) आओ कायरों, तुम पर भारत माँ का एक सपूत भी भारी पडेगा
(गोलियां चलती रहती हैं)
(दो चार गोलियां लगाती हैं)
(इतने में कैप्टन मदद ले कर जाता है)
(मेजर के प्राण निकलने वाले हैं।) कैप्टन उसका सर गोद में ले लेता है)
- सर... सर यह क्या हुआ
- कुछ नहीं मैंने उन्हें सबक सिखा दिया... (टूटती सासों से) एक एक को गिरा दिया... तेरे लिए नहीं छोड़ पायादोस्त
- आप मत बोलो, मेडिक आता होगा... (रोना रोकते हुए)।
- पिता जी से कहना, मैं पीछे नहीं हटा... कविता को भाभी तू दे देना... (टूटती सासों से) और माँ से कहना मैं उसे दिया वचन ना पूरा कर सका पर भारत माँ को दिया वचन निभा दिया... मैंने अपना कर्तव्य (आख़िरी सांस) जय हिंद
(पीछे "कट गए सर हमारे कोई गम नहीं..." या "कोई सिख कोई जाट मराठा, कोई गुरखा कोई बंगाली.... मेरे वतन के" गाना)

समाप्त...।

Monday, January 28, 2008

जाते जाते (एक कविता)

ना आरंभ में, और ना अंत में....
जीवन का अर्थ है, बस इनके अंतर में...
ना कुछ लाये थे हम, ना कुछ ले जायेंगे...
जाते जाते अपने कर्मों की, अमिट छाप छोड़ते जायेंगे....

माँ के आँचल में, या तरुवर की ठंडी छाव में....
वर्षा की बूंदों में, या कोयल की सुरीली तान में....
जो सुख मिलता है हमें, वह सुख सबको दे जायेंगे...
जीवन की तपती मरुभूमि पर, अमृत रस बरसायेंगे...
जाते जाते अपने कर्मों की, अमिट छाप छोड़ते जायेंगे....

स्व-रचित
- जयंत चौधरी (मार्च २६, २००७)

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